Monday, November 29, 2010

Bas yuhi muskurate hai

अक्सर चलते जब हम तनहा अकेले,
सर्द रातों की बाँहों में सिमटते सँभालते,
ना जाने किस सोच में डूब जाते है,
और किसकी आरज़ू में मुस्कुराते है.
उन गलियों से फिर मुड़ते है,
और किसी मैकश सी भीड़ में खो जाते है.

लेकिन फिर वोह वक़्त भी आता है,
जब आलम एक वीरा सा आता है,
उस तनहा से वीरान से आलम में,
किसी कशिश से बोझल बाँहों ने,
जब रूखे से नैनों की भाषा समझी है,
तब हलकी हलकी सी एक गूँज सुनायी है.

नि रे गा, रे गा माँ, सा रेगा माँ रेगानि,
गा माँ प्, माँ प् ध, प् निप् ध रेसानि,

के साथ उसके दो बोलों ने - रात के काले सायों में,
सुनहरी यादों के तरानों में,
दिल के तारों को जब छेदा है,
तब न जाने क्यूँ बस युही मुस्कुराते है.