Friday, April 15, 2011

Ek Nazm

जो निकले न दिल से तो फिर बात ही क्या है,
जो पहुचे न दिल तक तो मिया ग़ालिब ही क्या है.

जो पसंद आये बस ये दो लफ्ज़ तो न आना,
जो छु जाये अगर दिल को ये नज़्म तो आना.

की बैठे है हर रोज़ की तरह युही तनहा हम,
की जी रहे है हर रोज़ की तरह बिना पिए युही हम.

एहन दिन में अँधेरे और रातों में उजाले है,
एहन धुंध में तारे और गर्दिश में किनारे है.

जो तुमको हो वक़्त का न होश और न उम्र का ठिकाना,
जो तुमको हो मिलने का जोश और गम का तराना.

तो आ जाओ मिल कर एक पल प्यार भरा बिता ले,
तो आ इस पल में उम्र जो निकले उसे बचा ले.

मेरे दिल से जो निकले अपने दिल में समा लो,
मेरे यार आ मिल ले अपने हर एक फिक्र मिटा लो.

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